नया फोन या गाड़ी खरीदने से पहले हम उसके फीचर्स और कीमत की तुलना करते हैं। म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय भी स्कीम को समझना ज़रूरी है। निवेश का लक्ष्य क्या है, पैसे की ज़रूरत कब होगी और कितना उतार-चढ़ाव स्वीकार्य है? इन बातों पर विचार करके आप उपलब्ध स्कीमों का बेहतर आकलन कर सकते हैं।
म्यूचुअल फंड में निवेश क्यों करें?
म्यूचुअल फंड के जरिए अलग-अलग प्रकार की प्रतिभूतियों में निवेश किया जा सकता है। स्कीम के निवेश उद्देश्य के अनुसार फंड मैनेजर निवेश से जुड़े फैसले लेते हैं, इसलिए निवेशक को खुद हर शेयर या बॉन्ड चुनने की ज़रूरत नहीं होती। कई स्कीमों में छोटी राशि से निवेश शुरू करने की सुविधा भी मिलती है।
म्यूचुअल फंड में संभावित रिटर्न के साथ जोखिम भी होता है। इसलिए किसी स्कीम का चुनाव केवल संभावित रिटर्न के आधार पर नहीं करना चाहिए।
फिक्स्ड डिपॉज़िट और बचत खातों पर मिलने वाला रिटर्न निश्चित होता है, जबकि म्यूचुअल फंड का रिटर्न बाज़ार जोखिमों के अधीन होता है।
बात 1: अलग–अलग म्यूचुअल फंड में जोखिम का स्तर अलग होता है
हर म्यूचुअल फंड का जोखिम एक जैसा नहीं होता। इक्विटी फंड का मूल्य शेयर बाज़ार के उतार-चढ़ाव से प्रभावित होता है। डेट फंड में भी ब्याज दर और प्रतिभूतियां जारी करने वाली संस्थाओं से जुड़े जोखिम हो सकते हैं। हाइब्रिड फंड का जोखिम उसके एसेट आवंटन पर निर्भर करता है।
निवेश से पहले सोचें कि आप निवेश के मूल्य में कितना उतार-चढ़ाव स्वीकार कर सकते हैं। स्कीम का रिस्कोमीटर उसके जोखिम स्तर को समझने में मदद कर सकता है। SEBI के अनुसार, रिस्कोमीटर प्रत्येक म्यूचुअल फंड स्कीम से जुड़े जोखिम को दर्शाता है।
बात 2: अपने वित्तीय लक्ष्य और समय–सीमा तय करें
बच्चों की पढ़ाई, घर खरीदना, रिटायरमेंट या निकट भविष्य का कोई खर्च, हर लक्ष्य के लिए पैसे की ज़रूरत अलग समय पर हो सकती है। लक्ष्य और समय-सीमा स्पष्ट होने पर यह देखना आसान होता है कि किसी स्कीम का निवेश उद्देश्य और जोखिम स्तर आपकी ज़रूरत से मेल खाते हैं या नहीं।
बात 3: फंड चुनते समय केवल पिछले रिटर्न न देखें
पिछला रिटर्न किसी स्कीम के बारे में जानकारी देता है, लेकिन भविष्य का रिटर्न तय नहीं करता। स्कीम का निवेश उद्देश्य, पोर्टफोलियो, जोखिम स्तर और एक्सपेंस रेशियो भी देखें। इसके लिए स्कीम से जुड़े दस्तावेज़ पढ़ना उपयोगी है। SEBI भी निवेशकों को निवेश उद्देश्य, एसेट आवंटन, जोखिम और शुल्क की जांच करने को कहता है।
पिछला प्रदर्शन भविष्य में बना रह भी सकता है और नहीं भी।
इक्विटी, डेट या हाइब्रिड: किस पर विचार करें?
इक्विटी फंड, डेट फंड और हाइब्रिड फंड अलग-अलग प्रकार की प्रतिभूतियों में निवेश करते हैं। इक्विटी फंड में शेयरों का हिस्सा अधिक होता है। डेट फंड मुख्यतः डेट और मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करते हैं, जबकि हाइब्रिड फंड एक से अधिक एसेट क्लास में निवेश कर सकते हैं। किसी भी श्रेणी को चुनने से पहले संबंधित स्कीम का एसेट आवंटन, जोखिम स्तर और अपनी निवेश अवधि देखें।
बात 4: SIP और एकमुश्त निवेश में अंतर समझें
SIP के जरिए तय अंतराल पर एक निश्चित राशि निवेश की जाती है। यह उन लोगों के लिए सुविधाजनक हो सकता है जो नियमित रूप से निवेश करना चाहते हैं। एकमुश्त निवेश में उपलब्ध राशि एक साथ लगाई जाती है। कौन-सा तरीका उपयुक्त है, यह आपकी उपलब्ध राशि, लक्ष्य और निवेश की समय-सीमा पर निर्भर करता है।
SIP में समान राशि से NAV कम होने पर अधिक और NAV अधिक होने पर कम यूनिट्स मिलती हैं। इसे रुपी कॉस्ट एवरेजिंग कहा जाता है। हालांकि, इससे लाभ सुनिश्चित नहीं होता और बाज़ार गिरने पर नुकसान भी हो सकता है। AMFI इस सीमा को स्पष्ट करता है।
बात 5: अपने पोर्टफोलियो में विविधता पर ध्यान दें
अलग-अलग फंड या एसेट क्लास में निवेश बांटने से किसी एक निवेश के प्रदर्शन पर निर्भरता कम हो सकती है। हालांकि, केवल कई फंड रखने से विविधता नहीं मिलती। अगर उन फंड्स की होल्डिंग्स मिलती-जुलती हैं, तो आपका निवेश समान प्रतिभूतियों में केंद्रित रह सकता है।
विविधीकरण नुकसान से पूरी तरह नहीं बचाता। इसलिए अपने मौजूदा निवेश और नई स्कीम के पोर्टफोलियो को साथ में देखकर निर्णय लें।
निष्कर्ष
म्यूचुअल फंड में निवेश से पहले अपना लक्ष्य, समय-सीमा और जोखिम सहने की क्षमता समझें। फिर स्कीम का निवेश उद्देश्य, पोर्टफोलियो, जोखिम स्तर और खर्च देखें। SIP और एकमुश्त निवेश में से वह तरीका चुनें जो आपकी परिस्थितियों के अनुरूप हो। समय-समय पर पोर्टफोलियो की समीक्षा करने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि आपका निवेश अब भी आपके लक्ष्य के अनुसार है या नहीं।








































